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Chanchal Added a new story
अपनी पत्नी को क्यों दे रहे हैं तलाक???।
""रोंगटे खड़े"" कर देने वाली सच्ची घटना।

कल रात एक ऐसा वाकया हुआ जिसने मेरी ज़िन्दगी के कई पहलुओं को छू लिया.
करीब 7 बजे होंगे,
शाम को मोबाइल बजा ।
उठाया तो उधर से रोने की आवाज...
मैंने शांत कराया और पूछा कि भाभीजी आखिर हुआ क्या?

उधर से आवाज़ आई..
आप कहाँ हैं??? और कितनी देर में आ सकते हैं?
मैंने कहा:- "आप परेशानी बताइये"।
और "भाई साहब कहाँ हैं...?माताजी किधर हैं..?" "आखिर हुआ क्या...?"
लेकिन
उधर से केवल एक रट कि "आप आ जाइए", मैंने आश्वाशन दिया कि कम से कम एक घंटा पहुंचने में लगेगा. जैसे तैसे पूरी घबड़ाहट में पहुँचा;
देखा तो भाई साहब [हमारे मित्र जो जज हैं] सामने बैठे हुए हैं;

भाभीजी रोना चीखना कर रही हैं 12 साल का बेटा भी परेशान है; 9 साल की बेटी भी कुछ नहीं कह पा रही है।
मैंने भाई साहब से पूछा कि ""आखिर क्या बात है""*???
""भाई साहब कोई जवाब नहीं दे रहे थे "".
फिर भाभी जी ने कहा ये देखिये *तलाक के पेपर, ये कोर्ट से तैयार करा के लाये हैं, मुझे तलाक देना चाहते हैं,
मैंने पूछा - ये कैसे हो सकता है???. इतनी अच्छी फैमिली है. 2 बच्चे हैं. सब कुछ सेटल्ड है. ""प्रथम दृष्टि में मुझे लगा ये मजाक है"".

लेकिन मैंने बच्चों से पूछा दादी किधर है,
बच्चों ने बताया पापा ने उन्हें 3 दिन पहले नोएडा के वृद्धाश्रम में शिफ्ट कर दिया है.
मैंने घर के नौकर से कहा।
मुझे और भाई साहब को चाय पिलाओ;
कुछ देर में चाय आई. भाई साहब को बहुत कोशिशें कीं चाय पिलाने की.

लेकिन उन्होंने नहीं पी और कुछ ही देर में वो एक "मासूम बच्चे की तरह फूटफूट कर रोने लगे "बोले मैंने 3 दिन से कुछ भी नहीं खाया है. मैं अपनी 61 साल की माँ को कुछ लोगों के हवाले करके आया हूँ.
पिछले साल से मेरे घर में उनके लिए इतनी मुसीबतें हो गईं कि पत्नी (भाभीजी) ने कसम खा ली. कि ""मैं माँ जी का ध्यान नहीं रख सकती"" ना तो ये उनसे बात करती थी
और ना ही मेरे बच्चे बात करते थे. *रोज़ मेरे कोर्ट से आने के बाद माँ खूब रोती थी. नौकर तक भी *अपनी मनमानी से व्यवहार करते थे

माँ ने 10 दिन पहले बोल दिया.. बेटा तू मुझे ओल्ड ऐज होम में शिफ्ट कर दे.
मैंने बहुत कोशिशें कीं पूरी फैमिली को समझाने की, लेकिन किसी ने माँ से सीधे मुँह बात नहीं की.
जब मैं 2 साल का था तब पापा की मृत्यु हो गई थी दूसरों के घरों में काम करके ""मुझे पढ़ाया. मुझे इस काबिल बनाया कि आज मैं जज हूँ"". लोग बताते हैं माँ कभी दूसरों के घरों में काम करते वक़्त भी मुझे अकेला नहीं छोड़ती थीं.

उस माँ को मैं ओल्ड ऐज होम में शिफ्ट करके आया हूँ। पिछले 3 दिनों से
मैं अपनी माँ के एक-एक दुःख को याद करके तड़प रहा हूँ,जो उसने केवल मेरे लिए उठाये।
मुझे आज भी याद है जब..
""मैं 10th की परीक्षा में अपीयर होने वाला था. माँ मेरे साथ रात रात भर बैठी रहती"".
एक बार माँ को बहुत फीवर हुआ मैं तभी स्कूल से आया था. उसका शरीर गर्म था, तप रहा था. मैंने कहा *माँ तुझे फीवर है हँसते हुए बोली अभी खाना बना रही थी इसलिए गर्म है।

लोगों से उधार माँग कर मुझे दिल्ली विश्वविद्यालय से एलएलबी तक पढ़ाया. मुझे ट्यूशन तक नहीं पढ़ाने देती थीं कि कहीं मेरा टाइम ख़राब ना हो जाए.
कहते-कहते रोने लगे..और बोले--""जब ऐसी माँ के हम नहीं हो सके तो हम अपने बीबी और बच्चों के क्या होंगे"".

हम जिनके शरीर के टुकड़े हैं,आज हम उनको ऐसे लोगों के हवाले कर आये, ""जो उनकी आदत, उनकी बीमारी, उनके बारे में कुछ भी नहीं जानते"",
जब मैं ऐसी माँ के लिए कुछ नहीं कर सकता तो "मैं किसी और के लिए भला क्या कर सकता हूँ".
आज़ादी अगर इतनी प्यारी है और माँ इतनी बोझ लग रही हैं, तो मैं पूरी आज़ादी देना चाहता हूँ
.
जब मैं बिना बाप के पल गया तो ये बच्चे भी पल जाएंगे. इसीलिए मैं तलाक देना चाहता हूँ।

सारी प्रॉपर्टी इन लोगों के हवाले* करके उस ओल्ड ऐज होम में रहूँगा. कम से कम मैं माँ के साथ रह तो सकता हूँ।
और अगर इतना सब कुछ कर के ""माँ आश्रम में रहने के लिए मजबूर है"", तो एक दिन मुझे भी आखिर जाना ही पड़ेगा.

माँ के साथ रहते-रहते आदत भी हो जायेगी. माँ की तरह तकलीफ तो नहीं होगी.
जितना बोलते उससे भी ज्यादा रो रहे थे।

बातें करते करते रात के 12:30 हो गए।
मैंने भाभीजी के चेहरे को देखा.
उनके भाव भी प्रायश्चित्त और ग्लानि से भरे हुए थे; मैंने ड्राईवर से कहा अभी हम लोग नोएडा जाएंगे।
भाभीजी और बच्चे हम सारे लोग नोएडा पहुँचे.
बहुत ज़्यादा रिक्वेस्ट करने पर गेट खुला। भाई साहब ने उस गेटकीपर के पैर पकड़ लिए, बोले मेरी माँ है, मैं उसको लेने आया हूँ,
चौकीदार ने कहा क्या करते हो साहब,
भाई साहब ने कहा मैं जज हूँ,
उस चौकीदार ने कहा:-

""जहाँ सारे सबूत सामने हैं तब तो आप अपनी माँ के साथ न्याय नहीं कर पाये,
औरों के साथ क्या न्याय करते होंगे साहब"।

इतना कहकर हम लोगों को वहीं रोककर वह अन्दर चला गया.
अन्दर से एक महिला आई जो वार्डन थी.
उसने बड़े कातर शब्दों में कहा:-
"2 बजे रात को आप लोग ले जाके कहीं मार दें, तो

मैं अपने ईश्वर को क्या जबाब दूंगी..?"

मैंने सिस्टर से कहा आप विश्वास करिये. ये लोग *बहुत बड़े पश्चाताप में जी रहे हैं।
अंत में किसी तरह उनके कमरे में ले गईं. कमरे में जो दृश्य था, उसको कहने की स्थिति में मैं नहीं हूँ।

केवल एक फ़ोटो जिसमें पूरी फैमिली है और वो भी माँ जी के बगल में, जैसे किसी बच्चे को सुला रखा है.
मुझे देखीं तो उनको लगा कि बात न खुल जाए
लेकिन जब मैंने कहा हम लोग आप को लेने आये हैं, तो पूरी फैमिली एक दूसरे को पकड़ कर रोने लगी

आसपास के कमरों में और भी बुजुर्ग थे सब लोग जाग कर बाहर तक ही आ गए.
उनकी भी आँखें नम थीं
कुछ समय के बाद चलने की तैयारी हुई. पूरे आश्रम के लोग बाहर तक आये. किसी तरह हम लोग आश्रम के लोगों को छोड़ पाये.
सब लोग इस आशा से देख रहे थे कि शायद उनको भी कोई लेने आए, रास्ते भर बच्चे और भाभी जी तो शान्त रहे......

लेकिन भाई साहब और माताजी एक दूसरे की भावनाओं को अपने पुराने रिश्ते पर बिठा रहे थे।घर आते-आते करीब 3:45 हो गया.

भाभीजी भी अपनी ख़ुशी की चाबी कहाँ है; ये समझ गई थी।

मैं भी चल दिया. लेकिन *रास्ते भर वो सारी बातें और दृश्य घूमते रहे*.

""माँ केवल माँ है""

उसको मरने से पहले ना मारें.

माँ हमारी ताकत है उसे बेसहारा न होने दें , अगर वह कमज़ोर हो गई तो हमारी संस्कृति की ""रीढ़ कमज़ोर"" हो जाएगी , बिना रीढ़ का समाज कैसा होता है किसी से छुपा नहीं

अगर आपकी परिचित परिवार में ऐसी कोई समस्या हो तो उसको ये जरूर पढ़ायें, बात को प्रभावी ढंग से समझायें , कुछ भी करें लेकिन हमारी जननी को बेसहारा बेघर न होने दें, अगर माँ की आँख से आँसू गिर गए तो "ये क़र्ज़ कई जन्मों तक रहेगा", यकीन मानना सब होगा तुम्हारे पास पर ""सुकून नहीं होगा"" , सुकून सिर्फ माँ के आँचल में होता है उस आँचल को बिखरने मत देना।

इस मार्मिक दास्तान को खुद भी पढ़िये और अपने बच्चों को भी पढ़ाइये ताकि पश्चाताप न करना पड़े।
धन्यवाद!!!

#शेयर ताकि लोगो की आँखे खुल सके।
Chanchal Added a new story
एक पुरानी सी इमारत में था वैद्यजी का मकान था। पिछले हिस्से में रहते थे और अगले हिस्से में दवाख़ाना खोल रखा था। उनकी पत्नी की आदत थी कि दवाख़ाना खोलने से पहले उस दिन के लिए आवश्यक सामान एक चिठ्ठी में लिख कर दे देती थी। वैद्यजी गद्दी पर बैठकर पहले भगवान का नाम लेते फिर वह चिठ्ठी खोलते। पत्नी ने जो बातें लिखी होतीं, उनके भाव देखते , फिर उनका हिसाब करते। फिर परमात्मा से प्रार्थना करते कि हे भगवान ! मैं केवल तेरे ही आदेश के अनुसार तेरी भक्ति छोड़कर यहाँ दुनियादारी के चक्कर में आ बैठा हूँ। वैद्यजी कभी अपने मुँह से किसी रोगी से फ़ीस नहीं माँगते थे। कोई देता था, कोई नहीं देता था किन्तु एक बात निश्चित थी कि ज्यों ही उस दिन के आवश्यक सामान ख़रीदने योग्य पैसे पूरे हो जाते थे, उसके बाद वह किसी से भी दवा के पैसे नहीं लेते थे चाहे रोगी कितना ही धनवान क्यों न हो।

एक दिन वैद्यजी ने दवाख़ाना खोला। गद्दी पर बैठकर परमात्मा का स्मरण करके पैसे का हिसाब लगाने के लिए आवश्यक सामान वाली चिट्ठी खोली तो वह चिठ्ठी को एकटक देखते ही रह गए। एक बार तो उनका मन भटक गया। उन्हें अपनी आँखों के सामने तारे चमकते हुए नज़र आए किन्तु शीघ्र ही उन्होंने अपनी तंत्रिकाओं पर नियंत्रण पा लिया। आटे-दाल-चावल आदि के बाद पत्नी ने लिखा था, *"बेटी का विवाह 20 तारीख़ को है, उसके दहेज का सामान।"* कुछ देर सोचते रहे फिर बाकी चीजों की क़ीमत लिखने के बाद दहेज के सामने लिखा, '' *यह काम परमात्मा का है, परमात्मा जाने।*''

एक-दो रोगी आए थे। उन्हें वैद्यजी दवाई दे रहे थे। इसी दौरान एक बड़ी सी कार उनके दवाखाने के सामने आकर रुकी। वैद्यजी ने कोई खास तवज्जो नहीं दी क्योंकि कई कारों वाले उनके पास आते रहते थे। दोनों मरीज दवाई लेकर चले गए। वह सूटेड-बूटेड साहब कार से बाहर निकले और नमस्ते करके बेंच पर बैठ गए। वैद्यजी ने कहा कि अगर आपको अपने लिए दवा लेनी है तो इधर स्टूल पर आएँ ताकि आपकी नाड़ी देख लूँ और अगर किसी रोगी की दवाई लेकर जाना है तो बीमारी की स्थिति का वर्णन करें।

वह साहब कहने लगे "वैद्यजी! आपने मुझे पहचाना नहीं। मेरा नाम कृष्णलाल है लेकिन आप मुझे पहचान भी कैसे सकते हैं? क्योंकि मैं 15-16 साल बाद आपके दवाखाने पर आया हूँ। आप को पिछली मुलाकात का हाल सुनाता हूँ, फिर आपको सारी बात याद आ जाएगी। जब मैं पहली बार यहाँ आया था तो मैं खुद नहीं आया था अपितु ईश्वर मुझे आप के पास ले आया था क्योंकि ईश्वर ने मुझ पर कृपा की थी और वह मेरा घर आबाद करना चाहता था। हुआ इस तरह था कि मैं कार से अपने पैतृक घर जा रहा था। बिल्कुल आपके दवाखाने के सामने हमारी कार पंक्चर हो गई। ड्राईवर कार का पहिया उतार कर पंक्चर लगवाने चला गया। आपने देखा कि गर्मी में मैं कार के पास खड़ा था तो आप मेरे पास आए और दवाखाने की ओर इशारा किया और कहा कि इधर आकर कुर्सी पर बैठ जाएँ। अंधा क्या चाहे दो आँखें और कुर्सी पर आकर बैठ गया। ड्राइवर ने कुछ ज्यादा ही देर लगा दी थी।

एक छोटी-सी बच्ची भी यहाँ आपकी मेज़ के पास खड़ी थी और बार-बार कह रही थी, '' चलो न बाबा, मुझे भूख लगी है। आप उससे कह रहे थे कि बेटी थोड़ा धीरज धरो, चलते हैं। मैं यह सोच कर कि इतनी देर से आप के पास बैठा था और मेरे ही कारण आप खाना खाने भी नहीं जा रहे थे। मुझे कोई दवाई खरीद लेनी चाहिए ताकि आप मेरे बैठने का भार महसूस न करें। मैंने कहा वैद्यजी मैं पिछले 5-6 साल से इंग्लैंड में रहकर कारोबार कर रहा हूँ। इंग्लैंड जाने से पहले मेरी शादी हो गई थी लेकिन अब तक बच्चे के सुख से वंचित हूँ। यहाँ भी इलाज कराया और वहाँ इंग्लैंड में भी लेकिन किस्मत ने निराशा के सिवा और कुछ नहीं दिया।"

आपने कहा था, "मेरे भाई! भगवान से निराश न होओ। याद रखो कि उसके कोष में किसी चीज़ की कोई कमी नहीं है। आस-औलाद, धन-इज्जत, सुख-दुःख, जीवन-मृत्यु सब कुछ उसी के हाथ में है। यह किसी वैद्य या डॉक्टर के हाथ में नहीं होता और न ही किसी दवा में होता है। जो कुछ होना होता है वह सब भगवान के आदेश से होता है। औलाद देनी है तो उसी ने देनी है। मुझे याद है आप बातें करते जा रहे थे और साथ-साथ पुड़िया भी बनाते जा रहे थे। सभी दवा आपने दो भागों में विभाजित कर दो अलग-अलग लिफ़ाफ़ों में डाली थीं और फिर मुझसे पूछकर आप ने एक लिफ़ाफ़े पर मेरा और दूसरे पर मेरी पत्नी का नाम लिखकर दवा उपयोग करने का तरीका बताया था।

मैंने तब बेदिली से वह दवाई ले ली थी क्योंकि मैं सिर्फ कुछ पैसे आप को देना चाहता था। लेकिन जब दवा लेने के बाद मैंने पैसे पूछे तो आपने कहा था, बस ठीक है। मैंने जोर डाला, तो आपने कहा कि आज का खाता बंद हो गया है। मैंने कहा मुझे आपकी बात समझ नहीं आई। इसी दौरान वहां एक और आदमी आया उसने हमारी चर्चा सुनकर मुझे बताया कि खाता बंद होने का मतलब यह है कि आज के घरेलू खर्च के लिए जितनी राशि वैद्यजी ने भगवान से माँगी थी वह ईश्वर ने उन्हें दे दी है। अधिक पैसे वे नहीं ले सकते।

मैं कुछ हैरान हुआ और कुछ दिल में लज्जित भी कि मेरे विचार कितने निम्न थे और यह सरलचित्त वैद्य कितना महान है। मैंने जब घर जा कर पत्नी को औषधि दिखाई और सारी बात बताई तो उसके मुँह से निकला वो इंसान नहीं कोई देवता है और उसकी दी हुई दवा ही हमारे मन की मुराद पूरी करने का कारण बनेंगी। आज मेरे घर में दो फूल खिले हुए हैं। हम दोनों पति-पत्नी हर समय आपके लिए प्रार्थना करते रहते हैं। इतने साल तक कारोबार ने फ़ुरसत ही न दी कि स्वयं आकर आपसे धन्यवाद के दो शब्द ही कह जाता। इतने बरसों बाद आज भारत आया हूँ और कार केवल यहीं रोकी है।

वैद्यजी हमारा सारा परिवार इंग्लैंड में सेटल हो चुका है। केवल मेरी एक विधवा बहन अपनी बेटी के साथ भारत में रहती है। हमारी भान्जी की शादी इस महीने की 21 तारीख को होनी है। न जाने क्यों जब-जब मैं अपनी भान्जी के भात के लिए कोई सामान खरीदता था तो मेरी आँखों के सामने आपकी वह छोटी-सी बेटी भी आ जाती थी और हर सामान मैं दोहरा खरीद लेता था। मैं आपके विचारों को जानता था कि संभवतः आप वह सामान न लें किन्तु मुझे लगता था कि मेरी अपनी सगी भान्जी के साथ जो चेहरा मुझे बार-बार दिख रहा है वह भी मेरी भान्जी ही है। मुझे लगता था कि ईश्वर ने इस भान्जी के विवाह में भी मुझे भात भरने की ज़िम्मेदारी दी है।

वैद्यजी की आँखें आश्चर्य से खुली की खुली रह गईं और बहुत धीमी आवाज़ में बोले, '' कृष्णलाल जी, आप जो कुछ कह रहे हैं मुझे समझ नहीं आ रहा कि ईश्वर की यह क्या माया है। आप मेरी श्रीमती के हाथ की लिखी हुई यह चिठ्ठी देखिये।" और वैद्यजी ने चिट्ठी खोलकर कृष्णलाल जी को पकड़ा दी। वहाँ उपस्थित सभी यह देखकर हैरान रह गए कि ''दहेज का सामान'' के सामने लिखा हुआ था '' यह काम परमात्मा का है, परमात्मा जाने।''

काँपती-सी आवाज़ में वैद्यजी बोले, "कृष्णलाल जी, विश्वास कीजिये कि आज तक कभी ऐसा नहीं हुआ कि पत्नी ने चिठ्ठी पर आवश्यकता लिखी हो और भगवान ने उसी दिन उसकी व्यवस्था न कर दी हो। आपकी बातें सुनकर तो लगता है कि भगवान को पता होता है कि किस दिन मेरी श्रीमती क्या लिखने वाली हैं अन्यथा आपसे इतने दिन पहले ही सामान ख़रीदना आरम्भ न करवा दिया होता परमात्मा ने। वाह भगवान वाह! तू महान है तू दयावान है। मैं हैरान हूँ कि वह कैसे अपने रंग दिखाता है।"

वैद्यजी ने आगे कहा,सँभाला है, एक ही पाठ पढ़ा है कि सुबह परमात्मा का आभार करो, शाम को अच्छा दिन गुज़रने का आभार करो, खाते समय उसका आभार करो, सोते समय उसका आभार करो। 🙏🙏🙏🙏
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चाहता तो कहानी का शीर्षक ” मैं और चूहा ” रख सकता था , पर मेरा अहंकार इस चूहों ने निचे कर दिया है | जो मैं नहीं कर सकता वह मेरे घर का चूहा कर लेता है | जो इस देश का सामान्य आदमी नहीं कर पाता वह इस चूहे ने मेरे साथ करके बता दिया |

इस घर में एक मोटा चूहा है | जब छोटे भाई की पत्नी थी तब घर में खाना बनता था | इस बीच पारिवारिक दुर्घटनाओं, बहनोई की मृत्यु आदि के कारण हम लोग बाहर रहे |

इस चूहे ने अपना यह अधिकार मान लिया था कि मुझे खाने को इस घर में मिलेगा | ऐसा अधिकार आदमी भी अभी तक नहीं बन पाया पर चूहे ने मान लिया है | घर लगभग 45 दिन बंद रहा | मैं जब अकेला लौटा और घर खोला तो देखा कि चूहे ने काफी क्रॉकरी फर्श पर गिरा कर तोर डाली है |

वह खाने की तलाश में भर दौरता होगा | क्रॉकरी और डिब्बों में खाना तलाशता होगा | उसे नहीं मिलता होगा तो वह पड़ोस में कहीं कुछ खा लेता होगा और जिंदा रहता होगा | पर उसने घर नहीं छोड़ा | उसने इसी घर को अपना घर मान लिया था|

जब मैं घर में घुसा, बिजली जलाई तो मैंने देखा कि वह खुशी से चहकता हुआ यहाँ से वहां दौर रहा था | वह शायद समझ गया कि अब इस घर में खाना बनेगा डिब्बे खुलेंगे और उसी की थोड़ा उसे मिलेगी| दिन भर वह आनंद के सारे घर में घूमता रहा मैं देख रहा था | उसके उल्लास से मुझे अच्छा ही लगा|

पर घर में खाना बनना शुरू नहीं हुआ | मैं अकेला था बहन के यहां, जो पास में ही रहती है, दोपहर को भोजन कर लेता| रात को देर से खाता हूं तो बहन डिब्बा भेज देती है | खाना खाकर मैं डिब्बा बंद करके रख देता | चूहा निराश हो रहे थे | सोचते होंगे यह कैसा घर है आदमी आ गया है रोशनी भी है पर खाना नहीं बनता |

खाना बनता तो कुछ बिखरे दाने या रोटी के टुकड़े उसे मिल जाते मुझे मिलते | एक नया अनुभव हुआ | रात को चूहा बार-बार आता और जाता | कई बार मेरी नींद टूटती | मैं उसे भगाता लेकिन थोड़ी देर बाद फिर आ जाता और मेरे सिर के पास हलचल करने लगता |

वह भूखा था मगर उसे सर और पांव की समझ कैसे आई? वह मेरे पांव की तरफ गड़बड़ नहीं करता था, सीधे सिर की तरफ आता और हलचल करने लगता | एक दिन वह मच्छरदानी में घुस गया मैं बड़ा परेशान था की क्या करूं? इसे मारुँ ? और यह अगर किसी अलमारी के नीचे मर गया तो सरेगा और सारा घर दुर्गंध से भर जाएगा | फिर भारी अलमारी हटाकर मुझे निकालना पड़ेगा |

चूहा दिन भर भराभराता और रात को मुझे तंग करता | मुझे नींद आती मगर चूहा राम फिर मेरे सिर के पास बड़बड़ाने लगते | आखिर एक दिन मुझे समझ में आया कि चूहे को खाना चाहिए | क्योंकि उसने इस घर को अपना घर मान लिया है वह अपने अधिकार के प्रति सचेत है | वह रात को मेरे सिरहाने आकर शायद यह कहता होगा “क्यों रे तू आ गया है | मजे से खा रहा है मगर मैं भूखा मर रहा हूं | मैं इस घर का सदस्य हूं | मेरा भी हक है मैं तेरी नींद हराम कर दूंगा | ”

तब मैंने उसकी मांग पूरी करने की तरकीब निकाली | रात को मैंने भोजन का डिब्बा खोला तो पापड़ के कुछ टुकड़े यहां वहां डाल दिए | चूहा कहीं से निकला और एक टुकड़ा उठाकर अलमारी के नीचे आने लगा | भोजन करने के बाद मैंने रोटी के कुछ टुकड़े फर्श पर बिखरा-बिखरा दिए | सुबह देखा कि वह सब खा गया है |

अब यह रोजमर्रा का काम हो गया | मैं डिब्बा खोलता तो चूहा निकलकर देखने लगता | मैं एक दो टुकड़े डाल देता वह उठाकर ले जाता वह रात को उन्हें खा लेता और सो जाता | इधर मैं भी चैन की नींद सोता | चूहा अब मेरे सिर के पास गड़बड़ नहीं करता था |

मगर मैं सोचता हूं आदमी क्या चूहे से भी बदतर हो गया है | चूहे तो अपनी रोटी के हक के लिए मेरे सिर पर चढ़ जाता है, मेरी नींद हराम कर देता है | इस देश का आदमी कब चूहे की तरह आचरण करेगा?
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बहुत समय पहले की बात है एक गांव में राधा नाम की एक औरत रहती थी | राधा बहुत ही समझदार थी | उसके पास एक भेड़ थी | भेड़ जो दूध देती राधा उसमें से कुछ दूध बचा लेती | दूध से दही जमा लेती और दही से मक्खन निकाल लेती | छाछ तो वह पी लेती लेकिन मक्खन से घी निकाल लेती और उसे एक मटकी में डाल देती | धीरे-धीरे मटकी घी से भर गई | राधा ने सोचा अगर नगर में जाकर घी बेचा जाए तो काफी पैसे मिल जाएंगे | इन पैसों से वह घर की जरूरत का कुछ सामान खरीद सकती है|

इसीलिए वह घी की मटकी सिर पर उठाकर नगर की ओर चल पड़ी | उन दिनों आवाजाही के अधिक साधन नहीं थे | लोग अधिकतर पैदल ही सफर करते थे | रास्ता बहुत लंबा था | गर्मी भी बहुत थी इसीलिए राधा जल्दी ही थक गई | उसने सोचा थोड़ा आराम कर लूं | आराम करने के लिए वह बृछ के नीचे बैठ गई | घी कि मटकी उसने एक तरफ रख दी | बृछ की शीतल छाया में बैठते ही राधा को नींद आ गई | जब उसकी आंख खुली तो उसने देखा कि की मटकी वहां नहीं थी |



उसने घबरा कर इधर उधर देखा उसे थोड़ी दूर पर ही एक औरत अपने सिर पर मटकी लिए जाती दिखाई दी | राधा औरत के पीछे भागी | औरत के पास पहुंच कर राधा ने अपनी मटकी पहचान ली | राधा ने उस औरत से अपनी घी की मटकी मांगी| वह औरत बोली “यह मटकी तो मेरी है| तुम्हें क्यों दूं?” राधा ने बहुत विनती की लेकिन उस औरत पर कुछ असर ना हुआ |



उसने राधा की एक ना सुनी | राधा उसके साथ साथ चलती नगर पहुंच गई | नगर में पहुंचकर राधा ने मटकी के लिए बहुत शोर मचाया | शोर सुनकर लोग एकत्र हो गए | लोगों ने जब पूछा तो उस औरत ने मटकी को अपना बताया | लोग निर्णय नहीं पढ़ पाए कि वास्तव में मटकी किसकी है |



इसीलिए वह उन दोनों को पंचायत के पास ले गए | राधा ने सरपंच से कहा ” हुजूर इस औरत ने मेरी घी की मटकी चुरा ली| है कृपया मुझे मेरी मटकी दिला दे | मुझे यह घी बेचकर घर के लिए जरूरी सामान खरीदना है | ”



“तुम्हारे पास यह घी कहां से आया और इसने कैसे चुरा लिया?” सरपंच ने पूछा |



“मेरे पास एक भीड़ है | उसी के दूध से मैंने यही जमा किया है| रास्ते में आराम करने के लिए मैं एक वृक्ष की छाया में बैठी तो मुझे नींद आ गई | तभी यह औरत मेरी मटकी उठा कर चलती बनी | सरपंच ने उससे पूछा तो वह बोली “हुजूर आप ठीक ठीक न्याय करें | मैंने पिछले महीने में एक गाय खरीदी है जो बहुत दूध देती है | मैंने यह घी अपनी गाय के दूध से ही तैयार किया है | जरा सोचिए एक भेड़ रखने वाली औरत एक मटकी घी कैसे जमा कर सकती है? ”



सरपंच भी दोनों की बात सुनकर दुविधा में पड़ गया | वह भी निर्णय नहीं कर पा रहा था कि वास्तव में घी की मटकी किसकी है | उसने दोनों औरतों से पूछा “क्या तुम्हारे पास कोई सबूत है?” तो उन्होंने कहा कि उनके पास कोई सबूत नहीं है |



सरपंच को एक उपाय सूझा | उसने दोनों औरतों से कहा “वर्षा के पानी से कचहरी के सामने जो कीचड़ जमा हो गया है उसमें मेरे बेटे का एक जूता रह गया है |

तुम पहले वह जूता निकाल कर लाओ फिर मैं फैसला करूंगा | राधा और औरत कीचड़ में घुसकर जूता ढूंढने लगे | वह बहुत देर तक कीचड़ में हाथ पांव मरते रहे परंतु उन्हें जूता नहीं मिला | तब सरपंच ने उन्हें वापस आ जाने को कहा | ]



दोनों कीचड़ में लथपथ हो गई थी | सरपंच ने उन्हें एक एक लोटा पानी दिया | राधा ने तो उस एक लोटा पानी में से ही अपने हाथ पैर धोकर थोड़ा सा पानी बचा लिया परंतु गाय वाली वह औरत एक लोटा पानी से हाथ भी साफ नहीं कर पाई | उसने कहा “इतने पानी से क्या होगा ? मुझे एक बाल्टी पानी दो ताकि मैं ठीक से हाथ पांव धो सकूं|” सरपंच के आदेश से उसे और पानी दे दिया गया |



हाथ पांव धोने के बाद जब राधा उस औरत के साथ पंचायत में पहुंची तो सरपंच ने फैसला सुना दिया यह मटकी भेड़ वाली औरत की है | गाय वाली औरत जबरन उस पर अपना अधिकार जमा नहीं है | सब लोग सरपंच के न्याय से बहुत खुश हुए क्योंकि उन्होंने स्वयं देख लिया था कि राधा ने संयम से सिर्फ एक लोटा पानी से ही हाथ पांव धो लिए थे जबकि गाय वाली औरतों में संयम नाम मात्र को भी ना था | वह भला कि कैसे जमा कर सकती थी?
Chanchal Added a new story
एक छोटा सा गांव था | वहां पर उस गांव के किनारे एक नदी बहती थी | अक्सर वहां पर मछुआरे आपस में लड़ते-झगड़ते रहते थे | लड़ाई की वजह जल फेंकना होता था ताकि जो सबसे पहले जल फेंके उसके जाल में ज्यादा मछली आ जाए |



यह भी बड़ी विचित्र बात थी कि कई बार मछुआरे पूरे दिन भर की मेहनत के बाद भी खाली हाथ लौटते थे | मछुआरों के साथ-साथ उस दिन उनके घर के और लोग भी उदास हो जाते | मछली को लोग अपनी किस्मत मानने लगे थे |

इसकी वजह वह राधा था जो था तो पुरुष पर उसका नाम स्त्री का था | अक्सर लोग उसे चिढ़ाया करते पर वह किस्मत का धनी था | एक बार जाल खींचता तो फट से उसके जाल में मछलियां आ जाती | सब उसे चिढ़ाते थे पर वह फिर भी एक एक मछली सबको देता | बाकी बची मछलियां करने जाता घर ले जाता |

1 दिन जल फेंकते-फेंकते उसका पांव फिसल गया और वह नदी में गिर गया | मछुआरे अपनी लड़ाई में इतना व्यस्त हो कि किसी का ध्यान उसकी तरफ नहीं गया | तभी नदी के किनारे बैठे कुत्ते जोर-जोर से भौंकने लगे और मछुआरे के कपड़े खींचने लगे | उन कुत्तों में एक राधा का कुत्ता चीन भी था |

तभी मछुआरों ने देखा कि नदी में से एक आदमी बार-बार अपना सर निकाल रहा है | अब जाकर उन लोगों को कुत्तोँ का इशारा समझ में आया और फिर दो-तीन मछुआरे नदी में कूद गए |

तैरते तैरता आखिर वह उस आदमी तक पहुंच गए और उसे बाहर निकाल लिया | बाहर आने पर देखा तो वह राधा था | राधा के पेट में पानी भर गया था | सब ने मिलकर राधा को उल्टा लिया और उसके पेट का पानी निकाला | राधा के प्राण बच गए | अपने पास अपने मित्रों को देखकर वह भावुक हो गया|

कहने लगा “मैं कैसे तुम सबको धन्यवाद दूँ ?” सभी मछुआरे एक साथ बोले “नहीं -नहीं तुम्हारे प्राण तो इन कुत्तों ने बचाए हैं | हम तो मछली पकड़ने के लिए आपस में ही लड़ रहे थे पर यह कुत्ते जोड़-जोड़ के भोंकने लगे| तुम्हारा कुत्ता चीन हमारी धोती खींचने लगा और हमें यहां खींच लाया| हमको यह नहीं पता था की हम जिसे बचाने की कोशिश कर रहे हैं वह तुम हो | आज समझ में आया कि आदमी से ज्यादा जानवर वफादार वफादार होते हैं | देखो तुम्हारे कुत्ते ने तुम्हें बचाने के लिए अपने सारे साथियों को जमा कर दिया और एक हम हैं कि आपस में ही लड़ते रहे लेकिन अब ऐसा नहीं होगा क्योंकि जो आज तुम्हारे साथ हुआ वह कल हमारे साथ भी हो सकता है तुम्हारे पास तो तुम्हारा कुत्ता था पर हमारे पास तो कोई नहीं है | ”



तभी राधा ने कहा “ऐसा क्यों सोचते हो ? हम सब आपस में दोस्त ही तो हैं बस थोड़ी देर मछली पकड़ने की चीज में एक-दूसरे से बैर लेते हैं | मछलियां भी यह जान गई है इसलिए कभी-कभी वह किसी के जाल में नहीं आती | वह तुम्हारी हड़बड़ाहट से सचेत हो जाती है और भाग जाती है | मैं यह जानता हूं | इसलिए जब तुम लोग जाते हो और पानी शांत हो जाता है मैं तब जाल फेंकता हूँ | इसलिए वो मेरी पकड़ में आती है | आज से हम लोग आपस में झगड़ा नहीं करेंगे और चीन की तरह मिलकर रहेंगे | ”

यह कहकर सभी जोर से हंस पड़े | थोड़ी देर बाद जब सब राधा के घर पर थे और उसकी पत्नी कृष्णा सबके लिए मछली पका रही थी | आज कोई मछली नहीं ले गया था | सबकी मछलियां यही पकड़ी थी क्योंकि आज राधा को दूसरा जन्म मिला था |
Chanchal Added a new story
कहानी - बहन से वादा

सुबह बहन जल्दी उठती है और घर के सारे कामों को खत्म कर अपने भैया को जगाती है

बहन - भैया उठो ना,जल्दी से उठो ना, आज आज रक्षाबन्धन है ।
आप जल्दी से तैयार हो जाओ, मै सबसे पहले आपको राखी बांधुगी ।

भाई - ठीक है ।

भाई तैयार हो जाता है और बहन पूजा की थाली, मिठाई और राखी लेकर आती है

बहन - भैया अपना दाहिना हाथ आगे बढाओ ।

भाई अपना हाथ आगे करके राखी बंधवा लेता है और जेब से निकालकर उसको एक खूबसूरत घड़ी देता है ।

( जो उसने बहन के लिए एक दिन पहले ही खरीदी थी )

लेकिन बहन मना कर देती है फिर भाई अपने पर्स से कुछ पैसे निकाल कर देता है लेकिन बहन फिर वापस कर देती है

तब भाई पुछता है कि बताओ तुम्हे क्या चाहिए ?

बहन - जो मागुंगी वो दोगे ?

भाई - हां दुंगा ।

बहन - पहले मुझसे वादा करो ?

भाई - हां मैं पक्का वादा करता हूँ कि जो तू मांगेंगी वो मैं दुंगा ।

अब बोल तुझे क्या चाहिए ?

बहन - भैया आज रक्षाबन्धन के दिन आप मुझसे ये वादा करो कि आप आज से मां की बहन की गालियां नहीं दोगे । इतना कहकर उसकी आंखों में आसूं आ जाते हैं ।

(बहन रोते हुए ) भैया हम लोगों ने आप लोगों का क्या बिगाड़ रखा है जो हमेशा मां की बहन की गालियां देते हो हमें सरेआम बदनाम करते हो ।

बोलो भैया बोलो

भाई - ( सिर नीचे किये हुए चुप है)

बहन - आज रक्षाबंधन पर आप मुझसे वादा करते हो कि नहीं ?

भाई - ( आत्मग्लानि से रोते हुए ) हां बहन मैं आज तुमसे ये वादा करता हूं कि मैं जीवन में कभी मां की बहन की गाली नहीं दुंगा और ना ही किसी को देने दुंगा ।
फिर अपने आप को सम्हाल कर बहन को भी चुप कराता है ।
और कहता है कि......

मिठाई देखकर मुंह में पानी आ रहा है
चल अब जल्दी से मिठाई खिला.......

बहन थोड़ा हंसने लगती है उसकी आंखों में अभी भी आंसू थे लेकिन ये आंसू खुशी के थे, भाई पर आत्मविश्वास के थे ।

मै चाहता हूँ कि हर लड़की रक्षाबन्धन पर अपने भाई से यही मांगे ।

मेरा आप लोगों से निवेदन है कि इस बार इस कहानी को इतना शेयर करें कि ये कहानी हर भाई बहन के मोबाइल में हो

अगर इस बात से सहमत हैं तो शेयर करो
Ankur Singh Added a new story
एक सुनार से लक्ष्मी जी रूठ गई ।

जाते वक्त बोली मैं जा रही हूँ

और मेरी जगह नुकसान आ रहा है ।

तैयार हो जाओ।

लेकिन मै तुम्हे अंतिम भेट जरूर देना चाहती हूँ।
मांगो जो भी इच्छा हो।

सुनार बहुत समझदार था।
उसने ? विनती की नुकसान आए तो आने दो ।

लेकिन उससे कहना की मेरे परिवार में आपसी प्रेम बना रहे।
बस मेरी यही इच्छा है।

लक्ष्मी जी ने तथास्तु कहा।

कुछ दिन के बाद :-

सुनार की सबसे छोटी बहू खिचड़ी बना रही थी।

उसने नमक आदि डाला और अन्य काम करने लगी।

तब दूसरे लड़के की बहू आई और उसने भी बिना चखे नमक डाला और चली गई।

इसी प्रकार तीसरी, चौथी बहुएं आई और नमक डालकर चली गई ।

उनकी सास ने भी ऐसा किया।

शाम को सबसे पहले सुनार आया।

पहला निवाला मुह में लिया।
देखा बहुत ज्यादा नमक है।

लेकिन वह समझ गया नुकसान (हानि) आ चुका है।

चुपचाप खिचड़ी खाई और चला गया।

इसके बाद बङे बेटे का नम्बर आया।

पहला निवाला मुह में लिया।
पूछा पिता जी ने खाना खा लिया क्या कहा उन्होंने ?

सभी ने उत्तर दिया-" हाँ खा लिया, कुछ नही बोले।"

अब लड़के ने सोचा जब पिता जी ही कुछ नही बोले तो मै भी चुपचाप खा लेता हूँ।

इस प्रकार घर के अन्य सदस्य एक -एक आए।

पहले वालो के बारे में पूछते और चुपचाप खाना खा कर चले गए।

रात को नुकसान (हानि) हाथ जोड़कर

सुनार से कहने लगा -,"मै जा रहा हूँ।"

सुनार ने पूछा- क्यों ?

तब नुकसान (हानि ) कहता है, " आप लोग एक किलो तो नमक खा गए ।

लेकिन बिलकुल भी झगड़ा नही हुआ। मेरा यहाँ कोई काम नहीं।"

निचोङ

⭐झगड़ा कमजोरी, हानि, नुकसान की पहचान है।

?जहाँ प्रेम है, वहाँ लक्ष्मी का वास है।

?सदा प्यार -प्रेम बांटते रहे। छोटे -बङे की कदर करे ।

जो बङे हैं, वो बङे ही रहेंगे ।

चाहे आपकी कमाई उसकी कमाई से बङी हो। ????

अच्छा लगे तो आप जरुर किसी अपने को भेजें।
कॉवं कॉवं Added a new story
एक बच्चे को आम का पेड़ बहुत पसंद था।

जब भी फुर्सत मिलती वो आम के पेड के पास पहुच जाता।

पेड के उपर चढ़ता,आम खाता,खेलता और थक जाने पर उसी की छाया मे सो जाता।

उस बच्चे और आम के पेड के बीच एक अनोखा रिश्ता बन गया।

बच्चा जैसे-जैसे बडा होता गया वैसे-वैसे उसने पेड के पास आना कम कर दिया।

कुछ समय बाद तो बिल्कुल ही बंद हो गया।

आम का पेड उस बालक को याद करके अकेला रोता।

एक दिन अचानक पेड ने उस बच्चे को अपनी तरफ आते देखा और पास आने पर कहा,

"तू कहां चला गया था? मै रोज तुम्हे याद किया करता था। चलो आज फिर से दोनो खेलते है।"

बच्चे ने आम के पेड से कहा,
"अब मेरी खेलने की उम्र नही है

मुझे पढना है,लेकिन मेरे पास फीस भरने के पैसे नही है।"

पेड ने कहा,
"तू मेरे आम लेकर बाजार मे बेच दे,
इससे जो पैसे मिले अपनी फीस भर देना।"

उस बच्चे ने आम के पेड से सारे आम तोड़ लिए और उन सब आमो को लेकर वहा से चला गया।

उसके बाद फिर कभी दिखाई नही दिया।

आम का पेड उसकी राह देखता रहता।

एक दिन वो फिर आया और कहने लगा,
"अब मुझे नौकरी मिल गई है,
मेरी शादी हो चुकी है,

मुझे मेरा अपना घर बनाना है,इसके लिए मेरे पास अब पैसे नही है।"
आम के पेड ने कहा,

"तू मेरी सभी डाली को काट कर ले जा,उससे अपना घर बना ले।"
उस जवान ने पेड की सभी डाली काट ली और ले के चला गया।

आम के पेड के पास अब कुछ नहीं था वो अब बिल्कुल बंजर हो गया था।

कोई उसे देखता भी नहीं था।
पेड ने भी अब वो बालक/जवान उसके पास फिर आयेगा यह उम्मीद छोड दी थी।

फिर एक दिन अचानक वहाँ एक बुढा आदमी आया। उसने आम के पेड से कहा,

"शायद आपने मुझे नही पहचाना,
मैं वही बालक हूं जो बार-बार आपके पास आता और आप हमेशा अपने टुकड़े काटकर भी मेरी मदद करते थे।"

आम के पेड ने दु:ख के साथ कहा,

"पर बेटा मेरे पास अब ऐसा कुछ भी नही जो मै तुम्हे दे सकु।"

वृद्ध ने आंखो मे आंसु लिए कहा,

"आज मै आपसे कुछ लेने नही आया हूं बल्कि आज तो मुझे आपके साथ जी भरके खेलना है,

आपकी गोद मे सर रखकर सो जाना है।"

इतना कहकर वो आम के पेड से लिपट गया और आम के पेड की सुखी हुई डाली फिर से अंकुरित हो उठी।

वो आम का पेड़ कोई और नही हमारे माता-पिता हैं दोस्तों ।

जब छोटे थे उनके साथ खेलना अच्छा लगता था।

जैसे-जैसे बडे होते चले गये उनसे दुर होते गये।
पास भी तब आये जब कोई जरूरत पडी,
कोई समस्या खडी हुई।

आज कई माँ बाप उस बंजर पेड की तरह अपने बच्चों की राह देख रहे है।

जाकर उनसे लिपटे,
उनके गले लग जाये

फिर देखना वृद्धावस्था में उनका जीवन फिर से अंकुरित हो उठेगा।

आप से प्रार्थना करता हूँ यदि ये कहानी अच्छी लगी हो तो कृपया ज्यादा से ज्यादा लोगों को भेजे ताकि किसी की औलाद सही रास्ते पर आकर अपने माता पिता को गले लगा सके !
Priya Seth Added a new story
दो भाई थे ।
आपस में बहुत प्यार था।
खेत अलग अलग थे आजु बाजू।
:
बड़ा भाई शादीशुदा था ।

छोटा अकेला ।?
:
एक बार खेती बहुत अच्छी हुई अनाज
बहुत हुआ ।???
:
खेत में काम करते करते बड़े भाई ने
बगल के खेत में छोटे भाई को
खेत देखने का कहकर खाना खाने चला गया।♑??
:
उसके जाते ही छोटा भाई सोचने लगा । खेती
तो अच्छी हुई इस बार अनाज भी बहुत
हुआ। मैं तो अकेला हूँ, बड़े भाई की तो
गृहस्थी है। मेरे लिए तो ये अनाज
जरुरत से ज्यादा है
। भैया के साथ तो भाभी बच्चे है ।
उन्हें जरुरत ज्यादा है।??
:
ऐसा विचारकर वह 10 बोरे अनाज
बड़े भाई के अनाज में डाल देता
है। बड़ा भाई भोजन करके आता है ।
:
उसके आते ही छोटा भाई भोजन
के लिए चला जाता है।??
:
भाई के जाते ही वह विचारता है ।
मेरा गृहस्थ जीवन तो अच्छे से चल रहा है...?
:
भाई को तो अभी गृहस्थी जमाना है... उसे
अभी जिम्मेदारिया सम्हालना है...
मै इतने अनाज का
क्या करूँगा...?
:
ऐसा विचारकर उसने 10 बोरे अनाज
छोटे भाई के खेत में डाल दिया...।
:
दोनों भाईयों के मन में हर्ष था...?
अनाज उतना का उतना ही था और
हर्ष स्नेह वात्सल्य बढ़ा हुआ था...।
:
सोच अच्छी रखेंगें तो प्रेम?
अपने आप बढेगा ...........
अगर ऐसा प्रेम भाई भाई में हुआ तो दुनिया की कोई भी ताकत आपके परिवार को तोड़ नही सकती...
अगर ये लेख अच्छा लगा हो तो सिर्फ अपने तक ही मत रखिये इसे आगे शेयर करे♑???
Priya Seth Added a new story
बहुत समय पहले की बात है , किसी गाँव में एक किसान रहता था . वह रोज़ भोर में उठकर दूर झरनों से स्वच्छ पानी लेने जाया करता था . इस काम के लिए वह अपने साथ दो बड़े घड़े ले जाता था , जिन्हें वो डंडे में बाँध कर अपने कंधे पर दोनों ओर लटका लेता था .
उनमे से एक घड़ा कहीं से फूटा हुआ था ,और दूसरा एक दम सही था . इस वजह से रोज़ घर पहुँचते -पहुचते किसान के पास डेढ़ घड़ा पानी ही बच पाता था .ऐसा दो सालों से चल रहा था .

सही घड़े को इस बात का घमंड था कि वो पूरा का पूरा पानी घर पहुंचता है और उसके अन्दर कोई कमी नहीं है , वहीँ दूसरी तरफ फूटा घड़ा इस बात से शर्मिंदा रहता था कि वो आधा पानी ही घर तक पंहुचा पाता है और किसान की मेहनत बेकार चली जाती है . फूटा घड़ा ये सब सोच कर बहुत परेशान रहने लगा और एक दिन उससे रहा नहीं गया , उसने किसान से कहा , “ मैं खुद पर शर्मिंदा हूँ और आपसे क्षमा मांगना चाहता हूँ ?”
“क्यों ? “ , किसान ने पूछा , “ तुम किस बात से शर्मिंदा हो ?”
“शायद आप नहीं जानते पर मैं एक जगह से फूटा हुआ हूँ , और पिछले दो सालों से मुझे जितना पानी घर पहुँचाना चाहिए था बस उसका आधा ही पहुंचा पाया हूँ , मेरे अन्दर ये बहुत बड़ी कमी है , और इस वजह से आपकी मेहनत बर्वाद होती रही है .”, फूटे घड़े ने दुखी होते हुए कहा.
किसान को घड़े की बात सुनकर थोडा दुःख हुआ और वह बोला , “ कोई बात नहीं , मैं चाहता हूँ कि आज लौटते वक़्त तुम रास्ते में पड़ने वाले सुन्दर फूलों को देखो .”

घड़े ने वैसा ही किया , वह रास्ते भर सुन्दर फूलों को देखता आया , ऐसा करने से उसकी उदासी कुछ दूर हुई पर घर पहुँचते – पहुँचते फिर उसके अन्दर से आधा पानी गिर चुका था, वो मायूस हो गया और किसान से क्षमा मांगने लगा .
किसान बोला ,” शायद तुमने ध्यान नहीं दिया पूरे रास्ते में जितने भी फूल थे वो बस तुम्हारी तरफ ही थे , सही घड़े की तरफ एक भी फूल नहीं था . ऐसा इसलिए क्योंकि मैं हमेशा से तुम्हारे अन्दर की कमी को जानता था , और मैंने उसका लाभ उठाया . मैंने तुम्हारे तरफ वाले रास्ते पर रंग -बिरंगे फूलों के बीज बो दिए थे , तुम रोज़ थोडा-थोडा कर के उन्हें सींचते रहे और पूरे रास्ते को इतना खूबसूरत बना दिया . आज तुम्हारी वजह से ही मैं इन फूलों को भगवान को अर्पित कर पाता हूँ और अपना घर सुन्दर बना पाता हूँ . तुम्ही सोचो अगर तुम जैसे हो वैसे नहीं होते तो भला क्या मैं ये सब कुछ कर पाता ?”
दोस्तों हम सभी के अन्दर कोई ना कोई कमी होती है , पर यही कमियां हमें अनोखा बनाती हैं . उस किसान की तरह हमें भी हर किसी को वो जैसा है वैसे ही स्वीकारना चाहिए और उसकी अच्छाई की तरफ ध्यान देना चाहिए, और जब हम ऐसा करेंगे तब “फूटा घड़ा” भी “अच्छे घड़े” से मूल्यवान हो जायेगा.।

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STORY

HINDI कहानी

13

ENGLISH कहानी

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